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अपनी अपनी आजादी देश की आजादी के 70 साल बाद भी देश की जनता में अपनी अपनी आजादी की जंग धड़ल्ले से जारी है। सबको आजादी चाहिये किसी को आतंक से तो किसी को मुसलमानों से, किसी को आरक्षण से तो किसी को भेदभाव से, किसी को भ्रष्टाचार से तो कुछ नेताओं और कर्मचारियों को ईमानदार अधिकारियों से, किसी को 56 इंच से आजादी चाहिये तो किसी को कांग्रेस मुक्त भारत चाहिए, किसी को महंगे सामान से आजादी चाहिये तो किसी को चीन में बने सामान से। चीन को डोकलाम चाहिये, पाकिस्तान को कश्मीर चाहिये, पार्टियों को सत्ता चाहिये, आम आदमी को बढी हुई सेलरी चाहिये और गरीब को सस्ता राशन चाहिये। कुछ को गौमाता की भी आजादी चाहिये ये क्रान्तिकारी टाइप लोग हैं ये केवल शक होने पर भी की आप गौमाता को परेशान करते हैं आपकी टांगे तोड़ कर हाथ में दे सकते हैं और इनकी एक दूसरी ब्रांच भी है जिसका कार्य ही इसी तरह छापा मारकर ऐसा अनुमान लगा कर की कुछ लोग गलत कार्य कर रहे हैं उन लोगों को दण्ड देना है। ये दण्ड परिस्थितियों और राष्ट्रभक्तों के मूड पर भी निर्भर करता है। अगर आप पार्क में किसी लड़की के साथ बैठे हैं तो या तो आप को राखी बंधवाकर भी छोड़ा...
जी यस, टी प्रधानमंत्री मोदी जी चाय वाले से तरक्की करते करते षिखर पर पहुंच गए हैं पर आज तक अपनी जड़ों को नहीं भूल पाए हैं तभी तो हर मौके पर चाय चरहे अनचाहे चाय का जिक्र हो जाता है। चाहे वह मन की बात हो या फिर विदेश में कोई राजनीतिक मंच वैसे भी आजकल देश या तो चाय पर चर्चा कर रहा है या गाय पर। गाय पर ज्यादा चर्चा हो रही है तो चाय की ओर को भी ध्यान देना जरूरी है। चाय की चर्चा को आगे बढ़ाने के लिए मोदी जी ने सार्थक कदम उठाया है। कांग्रेस ने अपने पिछले कार्यकाल में जीएसटी लाने का मन बनाया था मगर उस समय भाजपा ने इस जीएसटी बिल का प्रबल विरोध किया था पर सत्ता में आने के बाद मोदी जी को एहसास हुआ कि जीएसटी देश के लिए गलत हो ही नहीं सकता क्योंकि जिसके नाम के साथ चाय या टी जुड़ा हो वो देषके लिए हानिकारक हो ही नहीं सकती। जी एस टी के नाम के अंत में टी अर्थात चाय शब्द जुड़ा है। चाय से जुड़ी हर चीज भारत के लिए फायदेमंद है भारत की अर्थव्यवस्था चाय से होकर जाती है जहां आदमी है सुबह होते ही चाय पीता है बिना चाय के ना उसकी सुबह खुलती है और ना उसका शरीर। बिना चाय और बिना चाय वाले के वर्तमान सामय में भारत के लो...
                                     पिया हमारे लल्लनटाॅप                 शादी के बाद से हमारे वो काफी बदल गये हैं। पहले बताया था शराब नहीं पीते हैं, बीड़ी सिगरेट का शौक नहीं है, गुटखा को हाथ भी नहीं लगाते और अच्छा कमा लेते हैं। पर शादी के बाद पता चला कि मोहल्ले में अक्सर पानी की किल्लत रहती है। बाल्टियां हाथ में लिए सरकारी नल के आगे खड़े खड़े रातें बीतती हैं तो पिया जी इस किल्लत को दूर करने के लिए पानी कम मिला कर शराब ज्यादा पी लेते हैं। मोहल्ला ज्यादा बड़ा नहीं है तो पियाजी को ढूंढने में बहुत ज्यादा मेहनत भी नहीं लगती, कभी उनका कोई सखा तो कभी मोहल्ले के केाई भले बच्चे दरवाजे तक घसीट कर देहली पर लिटा जाते हैं वरना तो कभी कभी अपने दम पर भी घर पंहुचते ही हैं। वैसे सही बात है बाड़ी सिगरेट का उन्हे शौक नही है, बल्कि लत है। 2 3 बंडल खतम कर देना शौक नहीं होता जुनून कहलाता है। हमारे इनके लिए तो सारी कायनात एक तरफ बीड़ी चाय एक तरफ। हमारे ये बताते हैं कि ‘हम ...
समरथ को नहीं दोष गुसांई उत्तराखण्ड में आज कई पर्वतीय जपनदों में आम जनजीवन की परिस्थितियां इतनी जटिल हो चुकी है जिसका सरकार शायद कोई अनुमान ही नहीं लगा पा रही है या लगाना ही नहीं चाह रही है। हर गांव, हर शहर के चैराहों में महिलाओं व क्षेत्रवासियों द्वारा शराब के विरोध में प्रदर्शन किये जा रहे हैं वहीं प्रदेश सरकार द्वारा इस विरोध पर आंख बन्द करते हुए आबकारी विभाग से विगत वर्ष की प्राप्त आय 1900 करोड़ को इस वर्ष बढाकर 2300 करोड़ करने का लक्ष्य रखा गया है।  16 वर्षों में 9 मुख्यमंत ्री देख चुके उत्तराखण्ड में इस बार पूर्ण बहुमत से आई सरकार के लिए इस बार अच्छा अवसर था कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के आधार पर अधिकांश जनता को सन्तुष्ट करते हुए नेशनल हाईवेज व स्टेट हाईवेज से शराब की दुकानों व बीयर बार को दूर कर दिया जाता परन्तु तुरन्त नया शासनादेश लाते हुए 64 स्टेट हाईवेज को जिला मार्गाें में तब्दील करने का फरमान सुना दिया गया। इसके बाद भी बची हुई शराब की दुकानें जिन्हें राष्ट्रीय राजमार्गों में आने के कारण 500 मीटर से दूर स्थापित किया जाना है उन्हें विस्थापित करने में प्रशासन की सांसे फूल रही...
                        पिता के पद पुत्रों के नाम                                 नेहरू जी जब कारागार में बंद थे तो उनके औ र इंदिरा जी के मध्य पत्राचार को संकलित कर ‘पिता के पत्र पुत्री के नाम‘ से एक पुस्तिका तैयार की गई थी। ये ज्ञान एक विरासत था पुत्री को अपने पिता के द्वारा। एक हम लोग हैं आम आदमी, क्या देके जाते हैं अपनी औलादों को विरासत में पुराना स्कूटर, पटखाट, बर्तन चूल्हा और थोड़ा बहुत अपने ऊपर का लोन। अब वो बेचारी औलादें इस वसीयत पर खुशी जाहिर करें या गम ये भी धर्मसंकट रहता है। अपने कर्मों पर तो हमारा सिर शर्म से तब से घुटनों में घुस जाता है जब बच्चों के साथ समाचार देख रहे हों और ब्रेकिंग खबर आ जाये की बेटे को ये पद या चुनाव टिकट नहीं मिलने पर वरिश्ठ एवं दिग्गज नेता ने पार्टी को ठोकर मार दी। बच्चे हमारी तरफ कलयुगी रिश्ते की नजरों से देखते हुए नजरों से ही कह डालते हैं- अभी भी कुछ शरम बाकी है आपमें। बाप का फर्ज इनसे सीखो। ये एक खबर हमारे ब...
ं     अच्छा चलता हूं, चुनावों में याद रखना   पिछले बार के चुनावों में दिखे नेता जी लोग एक बार फिर लोगों के दर्षन के लिए उपलब्ध हो चुके हैं। प्र्याप्त समय और पर्याप्त घोशणाओं के साथ पूरे न हो सके सपनों की एक लिस्ट भी मौजूद है जो पिछले कार्यकाल में या इस दरम्यान विपक्षियों के शड़यन्त्रों के कारण पूरी नहीं हो सकी थी पर इस बार जरूर पूरी होनी है। इस बार हर गांव में रोड आ जानी है और पानी भी हर गांव घर में आ जायेगा। लाइट की कोई समस्या अब नहीं रहेगी। हांॅस्पिटल और स्कूल में अब अच्छी सुविधाऐं मिलेंगी और ये सब चमत्कार कौन करेगा ? आप लोग। हम लोग, वो कैसे ? फलां नेता जी को अपना अमूल्य मत देकर। नेताजी की पहुंच बहुत ऊपर तक है। आपका लड़का क्या कर रहा है? बेरोजगार है, नेता जी से मिल लो, लड़के की नौकरी भी लगा देंगे। ऐसे ही दिलखुष सब्जबाग दिखाते नेतागण इस बीच दिखते रहेंगे और इन दिवास्वप्नों में उड़ने के लिए हम लोगों के पास दो माह का पर्याप्त समय है। साल के कुछ समय आदमी ने खुष भी रहना चाहिये। स्वास्थ्य सही रहता है और सकारात्मक विचार आते रहते हैं। षायद इसी सोच को मध्येनजर रखते हुए भारत में हर ...