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तुम दिन को अगर रात कहो रात कहेंगे जब उत्तराखण्ड की राज्य सरकारें अपनी वर्तमान कार्यप्रणाली के साथ नशामुक्त उत्तराखण्ड का नारा देती हैं तो उतनी ही हंसी आ जाती है जितनी कभी कभी कपिल शर्मा की कामेडी देखकर आ जाती थी। शराब का विरोध कर रही जनता को पिटवाकर और केस लगवाकर उनके गांवों में जबरन शराब की दुकानें खोलने वाली सरकार ने अपनी छवि साफ करने का निर्णय लिया हैं, पर इससे भी ज्यादा हास्यास्पद बात ये है कि उत्तराखण्ड में नशामुक्ति के ब्राण्ड एम्बेस्डर बनाये जाने के लिए जिन्हे चुना गया है वो हैं अपनी फिल्मों को धुंए और शराब  से भर देने वाले संजय दत्त उर्फ संजू बाबा। अगर उनसे ये सरकार शराब का विज्ञापन करवा लेती तो ज्यादा राजस्व हासिल करने में सुविधा होती। भांग की खेती को बढावा देने के सम्बन्ध में भी संजू बाबा का प्रचार काम में लाया जा सकता था परन्तु दुर्भाग्य है कि इस बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति का उत्तराखण्ड सरकार द्वारा दुरूपयोग किया जा रहा है। सही बंदे गलत धंधे के तर्ज पर इस नशामुक्ति अभियान के विज्ञापनों के बाद कितने और नशेड़ी तैयार होंगे इसकी जांच के लिए भी एक कमेटी बनाए दी ज...
हो रहा ये प्रचार है, तू इंसान नहीं अवतार है। संजू बाबा ने मुन्ना भाई में बोला था ‘बोले तो, बेड़ू लोग एक मस्त जादू की झप्पी देने का, सब काम हो जायेगा‘। शायद राहुल गांधी ने भी अपने अटके हुए काम के लिए कई टोटके किये, सारे फार्मूले ट्राई कर लिए, मनमोहन के अर्थशास्त्र से लेकर, दिग्गी के समाजशास्त्र और केजरीवाल के राजनीतिशास्त्र आजमाने के बाद भी जब कोई विशेष सफलता नहीं मिली तो संजू बाबा वाली गांधीगिरी अपनाने का तरीका मन को भा गया। वैसे राहुल जी संजू की हर फिल्म जरूर देखते हैं उनका कहना है ‘‘संजू को लोग बाबा कहकर पुकारते हैं, मुझे भी प्यार से कई लोग बाबा ही कहते हैं तो फिल्म एक बार देखना तो बनता है ना बाबा। फिर मुझे मुन्ना भाई की सबसे अच्छी बात लगी की उसमें गांधीगिरी से काम होता है, अब जबकी मैं तो आॅलरेडी गांधी हूं तो मुझे तो गिरी की जरूरत ही नहीं। जादू की झप्पी का मैं बहुत बड़ा फैन हूं। इसे सीखने में कई वर्ष लगाये हैं तब जाकर मैंने संसद में इसका प्रेक्टिकल किया। और मेरी इस झप्पी परफारमेन्स को मेरे सभी साथियों ने सराहा। सिब्बल साहब और राज बब्बर जी ने तो यहां तक कहा कि ‘ झप्पी देखकर रामाय...
                 पकोड़े पर चर्चा पिछले कुछ दिनों से पकोड़े जबरदस्त चर्चा में चल रहे हैं। पहले सिर्फ चाय वाला कहने पर ही दुकानदार का सीना तन कर 50-55 इंच का हो जाता था पर अब तो पकोड़े वाला शब्द भी रोजगार का प्रतीक बन कर उभर गया है। दो बातेें जो आजकल बहुत चर्चा में हैं वो हैं पकोड़ें और भगोड़े। ये दोनों जीवन के इस्टेबलिशमेन्ट के तरीके हैं। बेरोजगार रोजगार के लिए परेशान हो तो बिना सरकार को गलियाए अगर वो एक ठेला खोलकर पकोड़े बेचना शुरू कर दे तो वो खुद को सफल रोजगारी व्यक्ति मान सकता है और सरकार भी इसे आपनी सफलता मान लेगी। वहीं अगर आप में टेलंेट की मात्रा औरों से ज्यादा हो तो आप किसी राज्य सरकार के बजट से ज्यादा का सिर्फ लोन लेकर विदेश में आराम से सेटल हो सकते हैं। शर्त सिर्फ इतनी है कि आप पर ‘भगोड़ा‘ टाइटल का ताज पहना दिया जायगा और वैसे भी आजकल तो भगोड़ा कहलाना भी हमारे सोशल स्टेटस को बढाता ही है। जब विजय माल्या, ललित मोदी, नीरव मोदी जैसे अरबपति सेलेब्रिटी भगोड़ों की लिस्ट में हैं तो भगोड़ा कहला के इनकी जमात में षामिल होने पर किसी को विशेष एतराज नही...
                                      आओ कभी गुफाओं में   हर युग में भगवान पाप का भार बढ़ जाने पर उसके नाश के लिए अवतार लेते रहे हैं पर पाप का नाश करने के लिए पाप का बढना भी जरूरी है। अगर हर आदमी रोज सुबह आॅफिस या काम को जाये और शाम को घर आके टीवी पे बैठ जाये तो खाक पाप बढेगा और ऐसे निष्क्रिय लोगों के भरोसे बैठे रहें फिर तो हो गया भगवान का अवतार। भगवान के अवतरण होने में आनी वाली इन्ही समस्याओं के चलते ही कलियुगी बाबा लोगों ने ये जिम्मेदारी अपने सर पर उठा ली है कि भगवान के अवतरण के लिए माहौल वे लोग स्वयं तैयार कर के देंगे। हम अज्ञानी लोग समझ नहीं पा रहे हैं पर कलयुग में अपने को भगवान का अवतार बताने वाले ये बाबा जी लोग भगवान को अवतरित करने के प्रयास में ही लगे हैं, क्योंकि जब तक त्राहीमाम् ना हो भगवान धरती पर आके मारेंगे और तारेंगे किसको, ऐसे ही किसी को मार देने पर तो धारा 302 भी लग सकती है भगवान पर। कुछ तो हो भगवान के करने के लिए धरती पर। अगर त्रेता में रावण और बाकी राक्षस नहीं होते...
डूबते गांव, बचता हिमालय  मैं खुशकिस्मत हूं कि मेरे घर से स्वच्छ धवल हिमशिखर नंदादेवी, त्रिशूल, पंचाचूली समेत काफी विस्तृत हिमश्रृंखला का बहुत सुंदर दृश्य दिखता है। इतना सुंदर कि कभी कभी लगता है जैसे प्रकृति द्वारा एक बड़ा सा वॉलपेपर लगाया गया हो। कभी-कभी जाड़ों में घंटो इसे देखता रहता हूं। पर जब मैंने पिछले कुछ दिनों में सरकार द्वारा बड़े बड़े कार्यक्रमों में हिमालय को बचाने की शपथ लेते हुए और देते हुए देखा तो यूं ही ख्याल आया कि क्या हिमालय सिर्फ बर्फ का एक पहाड़ है जिसे हमने बचा  लेना है। क्या ये नदियां, यह गांव, ये जंगल हिमालय का हिस्सा नहीं है क्या यहां की संस्कृति यहां की सभ्यता हिमालय का हिस्सा नहीं है। क्या इन सब से अलग होकर हिमालय अपना अर्थ नहीं खो देता। क्या ये हिमालय हम लोगों का घर हमारा आश्रय हमारा पर्यावरण नहीं है। आज हम इसी हिमालयी पर्यावरण से खिलवाड़ करते हुए जनता में चर्चा पाने के लिए इसे ही बचाने की शपथ भी लेते जा रहे हैं। जहां एक ओर विकास के नाम पर भारत के 120 वर्ग किमी क्षेत्र में स्थित 134 हिमालयी गांव को डुबा कर क्षेत्र की लगभग 33000 की आबादी को यहां से पलायन क...
अपनी अपनी आजादी देश की आजादी के 70 साल बाद भी देश की जनता में अपनी अपनी आजादी की जंग धड़ल्ले से जारी है। सबको आजादी चाहिये किसी को आतंक से तो किसी को मुसलमानों से, किसी को आरक्षण से तो किसी को भेदभाव से, किसी को भ्रष्टाचार से तो कुछ नेताओं और कर्मचारियों को ईमानदार अधिकारियों से, किसी को 56 इंच से आजादी चाहिये तो किसी को कांग्रेस मुक्त भारत चाहिए, किसी को महंगे सामान से आजादी चाहिये तो किसी को चीन में बने सामान से। चीन को डोकलाम चाहिये, पाकिस्तान को कश्मीर चाहिये, पार्टियों को सत्ता चाहिये, आम आदमी को बढी हुई सेलरी चाहिये और गरीब को सस्ता राशन चाहिये। कुछ को गौमाता की भी आजादी चाहिये ये क्रान्तिकारी टाइप लोग हैं ये केवल शक होने पर भी की आप गौमाता को परेशान करते हैं आपकी टांगे तोड़ कर हाथ में दे सकते हैं और इनकी एक दूसरी ब्रांच भी है जिसका कार्य ही इसी तरह छापा मारकर ऐसा अनुमान लगा कर की कुछ लोग गलत कार्य कर रहे हैं उन लोगों को दण्ड देना है। ये दण्ड परिस्थितियों और राष्ट्रभक्तों के मूड पर भी निर्भर करता है। अगर आप पार्क में किसी लड़की के साथ बैठे हैं तो या तो आप को राखी बंधवाकर भी छोड़ा...
जी यस, टी प्रधानमंत्री मोदी जी चाय वाले से तरक्की करते करते षिखर पर पहुंच गए हैं पर आज तक अपनी जड़ों को नहीं भूल पाए हैं तभी तो हर मौके पर चाय चरहे अनचाहे चाय का जिक्र हो जाता है। चाहे वह मन की बात हो या फिर विदेश में कोई राजनीतिक मंच वैसे भी आजकल देश या तो चाय पर चर्चा कर रहा है या गाय पर। गाय पर ज्यादा चर्चा हो रही है तो चाय की ओर को भी ध्यान देना जरूरी है। चाय की चर्चा को आगे बढ़ाने के लिए मोदी जी ने सार्थक कदम उठाया है। कांग्रेस ने अपने पिछले कार्यकाल में जीएसटी लाने का मन बनाया था मगर उस समय भाजपा ने इस जीएसटी बिल का प्रबल विरोध किया था पर सत्ता में आने के बाद मोदी जी को एहसास हुआ कि जीएसटी देश के लिए गलत हो ही नहीं सकता क्योंकि जिसके नाम के साथ चाय या टी जुड़ा हो वो देषके लिए हानिकारक हो ही नहीं सकती। जी एस टी के नाम के अंत में टी अर्थात चाय शब्द जुड़ा है। चाय से जुड़ी हर चीज भारत के लिए फायदेमंद है भारत की अर्थव्यवस्था चाय से होकर जाती है जहां आदमी है सुबह होते ही चाय पीता है बिना चाय के ना उसकी सुबह खुलती है और ना उसका शरीर। बिना चाय और बिना चाय वाले के वर्तमान सामय में भारत के लो...