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                 पकोड़े पर चर्चा पिछले कुछ दिनों से पकोड़े जबरदस्त चर्चा में चल रहे हैं। पहले सिर्फ चाय वाला कहने पर ही दुकानदार का सीना तन कर 50-55 इंच का हो जाता था पर अब तो पकोड़े वाला शब्द भी रोजगार का प्रतीक बन कर उभर गया है। दो बातेें जो आजकल बहुत चर्चा में हैं वो हैं पकोड़ें और भगोड़े। ये दोनों जीवन के इस्टेबलिशमेन्ट के तरीके हैं। बेरोजगार रोजगार के लिए परेशान हो तो बिना सरकार को गलियाए अगर वो एक ठेला खोलकर पकोड़े बेचना शुरू कर दे तो वो खुद को सफल रोजगारी व्यक्ति मान सकता है और सरकार भी इसे आपनी सफलता मान लेगी। वहीं अगर आप में टेलंेट की मात्रा औरों से ज्यादा हो तो आप किसी राज्य सरकार के बजट से ज्यादा का सिर्फ लोन लेकर विदेश में आराम से सेटल हो सकते हैं। शर्त सिर्फ इतनी है कि आप पर ‘भगोड़ा‘ टाइटल का ताज पहना दिया जायगा और वैसे भी आजकल तो भगोड़ा कहलाना भी हमारे सोशल स्टेटस को बढाता ही है। जब विजय माल्या, ललित मोदी, नीरव मोदी जैसे अरबपति सेलेब्रिटी भगोड़ों की लिस्ट में हैं तो भगोड़ा कहला के इनकी जमात में षामिल होने पर किसी को विशेष एतराज नही...
                                      आओ कभी गुफाओं में   हर युग में भगवान पाप का भार बढ़ जाने पर उसके नाश के लिए अवतार लेते रहे हैं पर पाप का नाश करने के लिए पाप का बढना भी जरूरी है। अगर हर आदमी रोज सुबह आॅफिस या काम को जाये और शाम को घर आके टीवी पे बैठ जाये तो खाक पाप बढेगा और ऐसे निष्क्रिय लोगों के भरोसे बैठे रहें फिर तो हो गया भगवान का अवतार। भगवान के अवतरण होने में आनी वाली इन्ही समस्याओं के चलते ही कलियुगी बाबा लोगों ने ये जिम्मेदारी अपने सर पर उठा ली है कि भगवान के अवतरण के लिए माहौल वे लोग स्वयं तैयार कर के देंगे। हम अज्ञानी लोग समझ नहीं पा रहे हैं पर कलयुग में अपने को भगवान का अवतार बताने वाले ये बाबा जी लोग भगवान को अवतरित करने के प्रयास में ही लगे हैं, क्योंकि जब तक त्राहीमाम् ना हो भगवान धरती पर आके मारेंगे और तारेंगे किसको, ऐसे ही किसी को मार देने पर तो धारा 302 भी लग सकती है भगवान पर। कुछ तो हो भगवान के करने के लिए धरती पर। अगर त्रेता में रावण और बाकी राक्षस नहीं होते...
डूबते गांव, बचता हिमालय  मैं खुशकिस्मत हूं कि मेरे घर से स्वच्छ धवल हिमशिखर नंदादेवी, त्रिशूल, पंचाचूली समेत काफी विस्तृत हिमश्रृंखला का बहुत सुंदर दृश्य दिखता है। इतना सुंदर कि कभी कभी लगता है जैसे प्रकृति द्वारा एक बड़ा सा वॉलपेपर लगाया गया हो। कभी-कभी जाड़ों में घंटो इसे देखता रहता हूं। पर जब मैंने पिछले कुछ दिनों में सरकार द्वारा बड़े बड़े कार्यक्रमों में हिमालय को बचाने की शपथ लेते हुए और देते हुए देखा तो यूं ही ख्याल आया कि क्या हिमालय सिर्फ बर्फ का एक पहाड़ है जिसे हमने बचा  लेना है। क्या ये नदियां, यह गांव, ये जंगल हिमालय का हिस्सा नहीं है क्या यहां की संस्कृति यहां की सभ्यता हिमालय का हिस्सा नहीं है। क्या इन सब से अलग होकर हिमालय अपना अर्थ नहीं खो देता। क्या ये हिमालय हम लोगों का घर हमारा आश्रय हमारा पर्यावरण नहीं है। आज हम इसी हिमालयी पर्यावरण से खिलवाड़ करते हुए जनता में चर्चा पाने के लिए इसे ही बचाने की शपथ भी लेते जा रहे हैं। जहां एक ओर विकास के नाम पर भारत के 120 वर्ग किमी क्षेत्र में स्थित 134 हिमालयी गांव को डुबा कर क्षेत्र की लगभग 33000 की आबादी को यहां से पलायन क...
अपनी अपनी आजादी देश की आजादी के 70 साल बाद भी देश की जनता में अपनी अपनी आजादी की जंग धड़ल्ले से जारी है। सबको आजादी चाहिये किसी को आतंक से तो किसी को मुसलमानों से, किसी को आरक्षण से तो किसी को भेदभाव से, किसी को भ्रष्टाचार से तो कुछ नेताओं और कर्मचारियों को ईमानदार अधिकारियों से, किसी को 56 इंच से आजादी चाहिये तो किसी को कांग्रेस मुक्त भारत चाहिए, किसी को महंगे सामान से आजादी चाहिये तो किसी को चीन में बने सामान से। चीन को डोकलाम चाहिये, पाकिस्तान को कश्मीर चाहिये, पार्टियों को सत्ता चाहिये, आम आदमी को बढी हुई सेलरी चाहिये और गरीब को सस्ता राशन चाहिये। कुछ को गौमाता की भी आजादी चाहिये ये क्रान्तिकारी टाइप लोग हैं ये केवल शक होने पर भी की आप गौमाता को परेशान करते हैं आपकी टांगे तोड़ कर हाथ में दे सकते हैं और इनकी एक दूसरी ब्रांच भी है जिसका कार्य ही इसी तरह छापा मारकर ऐसा अनुमान लगा कर की कुछ लोग गलत कार्य कर रहे हैं उन लोगों को दण्ड देना है। ये दण्ड परिस्थितियों और राष्ट्रभक्तों के मूड पर भी निर्भर करता है। अगर आप पार्क में किसी लड़की के साथ बैठे हैं तो या तो आप को राखी बंधवाकर भी छोड़ा...
जी यस, टी प्रधानमंत्री मोदी जी चाय वाले से तरक्की करते करते षिखर पर पहुंच गए हैं पर आज तक अपनी जड़ों को नहीं भूल पाए हैं तभी तो हर मौके पर चाय चरहे अनचाहे चाय का जिक्र हो जाता है। चाहे वह मन की बात हो या फिर विदेश में कोई राजनीतिक मंच वैसे भी आजकल देश या तो चाय पर चर्चा कर रहा है या गाय पर। गाय पर ज्यादा चर्चा हो रही है तो चाय की ओर को भी ध्यान देना जरूरी है। चाय की चर्चा को आगे बढ़ाने के लिए मोदी जी ने सार्थक कदम उठाया है। कांग्रेस ने अपने पिछले कार्यकाल में जीएसटी लाने का मन बनाया था मगर उस समय भाजपा ने इस जीएसटी बिल का प्रबल विरोध किया था पर सत्ता में आने के बाद मोदी जी को एहसास हुआ कि जीएसटी देश के लिए गलत हो ही नहीं सकता क्योंकि जिसके नाम के साथ चाय या टी जुड़ा हो वो देषके लिए हानिकारक हो ही नहीं सकती। जी एस टी के नाम के अंत में टी अर्थात चाय शब्द जुड़ा है। चाय से जुड़ी हर चीज भारत के लिए फायदेमंद है भारत की अर्थव्यवस्था चाय से होकर जाती है जहां आदमी है सुबह होते ही चाय पीता है बिना चाय के ना उसकी सुबह खुलती है और ना उसका शरीर। बिना चाय और बिना चाय वाले के वर्तमान सामय में भारत के लो...
                                     पिया हमारे लल्लनटाॅप                 शादी के बाद से हमारे वो काफी बदल गये हैं। पहले बताया था शराब नहीं पीते हैं, बीड़ी सिगरेट का शौक नहीं है, गुटखा को हाथ भी नहीं लगाते और अच्छा कमा लेते हैं। पर शादी के बाद पता चला कि मोहल्ले में अक्सर पानी की किल्लत रहती है। बाल्टियां हाथ में लिए सरकारी नल के आगे खड़े खड़े रातें बीतती हैं तो पिया जी इस किल्लत को दूर करने के लिए पानी कम मिला कर शराब ज्यादा पी लेते हैं। मोहल्ला ज्यादा बड़ा नहीं है तो पियाजी को ढूंढने में बहुत ज्यादा मेहनत भी नहीं लगती, कभी उनका कोई सखा तो कभी मोहल्ले के केाई भले बच्चे दरवाजे तक घसीट कर देहली पर लिटा जाते हैं वरना तो कभी कभी अपने दम पर भी घर पंहुचते ही हैं। वैसे सही बात है बाड़ी सिगरेट का उन्हे शौक नही है, बल्कि लत है। 2 3 बंडल खतम कर देना शौक नहीं होता जुनून कहलाता है। हमारे इनके लिए तो सारी कायनात एक तरफ बीड़ी चाय एक तरफ। हमारे ये बताते हैं कि ‘हम ...
समरथ को नहीं दोष गुसांई उत्तराखण्ड में आज कई पर्वतीय जपनदों में आम जनजीवन की परिस्थितियां इतनी जटिल हो चुकी है जिसका सरकार शायद कोई अनुमान ही नहीं लगा पा रही है या लगाना ही नहीं चाह रही है। हर गांव, हर शहर के चैराहों में महिलाओं व क्षेत्रवासियों द्वारा शराब के विरोध में प्रदर्शन किये जा रहे हैं वहीं प्रदेश सरकार द्वारा इस विरोध पर आंख बन्द करते हुए आबकारी विभाग से विगत वर्ष की प्राप्त आय 1900 करोड़ को इस वर्ष बढाकर 2300 करोड़ करने का लक्ष्य रखा गया है।  16 वर्षों में 9 मुख्यमंत ्री देख चुके उत्तराखण्ड में इस बार पूर्ण बहुमत से आई सरकार के लिए इस बार अच्छा अवसर था कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के आधार पर अधिकांश जनता को सन्तुष्ट करते हुए नेशनल हाईवेज व स्टेट हाईवेज से शराब की दुकानों व बीयर बार को दूर कर दिया जाता परन्तु तुरन्त नया शासनादेश लाते हुए 64 स्टेट हाईवेज को जिला मार्गाें में तब्दील करने का फरमान सुना दिया गया। इसके बाद भी बची हुई शराब की दुकानें जिन्हें राष्ट्रीय राजमार्गों में आने के कारण 500 मीटर से दूर स्थापित किया जाना है उन्हें विस्थापित करने में प्रशासन की सांसे फूल रही...